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वाल्मीकि रामायण 33.11

दीर्घ वृत्त भुजह् श्रीमान् महा उरस्कह् प्रतापवान् ।
धन्वी सम्हनन उपेतो धर्म आत्मा भुवि विश्रुतः ।। ६-३३-११

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