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वाल्मीकि रामायण 32.24

अग्निष्तोम आदिभिर् यज्नैर् इष्टवान् आप्त दक्षिणैः ।
अग्नि होत्रेण संस्कारम् केन त्वम् तु न लप्स्यसे ।। ६-३२-२४।।

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