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वाल्मीकि रामायण 32.17

अर्चितम् सततम् यत्नाद् गन्ध माल्यैर् मया तव ।
इदम् ते मत् प्रियम् वीर धनुः कान्चन भूषितम् ।। ६-३२-१७।।

पूरा अध्याय