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वाल्मीकि रामायण 118.18

तद्गच्छ ह्यभ्यनुज्ञाता यथेष्टं जनकात्मजे ।
एता दश दिशो भद्रे कार्यमस्ति न मे त्वया ।। ६.११८.१८ ।।

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