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वाल्मीकि रामायण 118.17

प्राप्तचारित्रसन्देहा मम प्रतिमुखे स्थिता ।
दीपो नेत्रातुरस्येव प्रतिकूला ऽसि मे दृढम् ।। ६.११८.१७ ।।

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