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वाल्मीकि रामायण 105.4

पूरितः शरजालेन धनुर्मुक्तेन संयुगे ।
महागिरिरिवाकम्प्यः काकुत्स्थो न प्रकम्पते ।। ६.१०५.४ ।।

पूरा अध्याय