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वाल्मीकि रामायण 101.63

स कीर्यमाणः शरजालवृष्टिभिर्महात्मना दीप्तधनुष्मता ऽर्दितः ।
भयात् प्रदुद्राव समेत्य रावणो यथा ऽनिलेनाभिहतो बलाहकः ।। ६.१०१.६३ ।।

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