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वाल्मीकि रामायण 67.13

क्षिप्तवांस्त्वं प्रदीप्तं हि दर्भं तं वायसं प्रति ।
ततस्तु वायसं दीप्तः स दर्भो ऽनुजगाम ह ।। ५.६७.१३ ।।।।

पूरा अध्याय