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वाल्मीकि रामायण 59.31

एकवेणीधरा दीना भर्तृचिन्तापरायणा ।
अधः शय्या विवर्णाङ्गी पद्मिनीव हिमागमे ।। ५.५९.३१ ।।।।

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