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वाल्मीकि रामायण 58.43

सा विसृष्टभुजा भीमा पपात लवणाम्भसि ।
मया पर्वतसङ्काशा निकृत्तहृदया सती ।। ५.५८.४३ ।।।।

पूरा अध्याय