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वाल्मीकि रामायण 58.100

प्रणम्य शिरसा देवीमहमार्यामनिन्दिताम् ।
राघवस्य मनोह्लादमभिज्ञानमयाचिषम् ।। ५.५८.१०० ।।।।

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