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वाल्मीकि रामायण 57.8

प्रविशन्नभ्रजालानि निष्पतंश्च पुनः पुनः ।
प्रच्छन्नश्च प्रकाशश्च चन्द्रमा इव लक्ष्यते ।। 5.57.8 ।।।।

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