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वाल्मीकि रामायण 57.38

अशोकवनिकासंस्था दृष्टा सा जनकात्मजा ।
रक्ष्यमाणा सुघोराभी राक्षसीभिरनिन्दिता ।। 5.57.38 ।।।।

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