Utshovऐप डाउनलोड करें

वाल्मीकि रामायण 57.10

तार्क्ष्यायमाणो गगने बभासे वायुनन्दनः ।
दारयन् मेघवृन्दानि निष्पतंश्च पुनः पुनः ।। 5.57.10 ।।।।

पूरा अध्याय