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वाल्मीकि रामायण 56.7

क्षिप्रमेष्यति काकुत्स्थो हर्यृक्षप्रवरैर्वृतः ।
यस्ते युधि विजित्यारीन् शोकं व्यपनयिष्यति ।। 5.56.7 ।।।।

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