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वाल्मीकि रामायण 56.6

तदर्थोपहितं वाक्यं प्रश्रितं हेतुसंहितम् ।
निशम्य हनुमांस्तस्या वाक्यमुत्तरमब्रवीत् ।। 5.56.6 ।।।।

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