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वाल्मीकि रामायण 55.31

अहो खलु कृतं कर्म दुष्करं हि हनूमता ।
अग्निं विसृजता ऽभीक्ष्णं भीमं राक्षसवेश्मनि ।। 5.55.31 ।।।।

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