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वाल्मीकि रामायण 55.29

तपसा सत्यवाक्येन अनन्यत्वाच्च भर्तरि ।
अपि सा निर्दहेदग्निं न तामग्निः प्रधक्ष्यति ।। 5.55.29 ।।।।

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