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वाल्मीकि रामायण 55.24

न हि धर्मात्मनस्तस्य भार्याममिततेजसः ।
स्वाचारित्राभिगुप्तां तां स्प्रष्टुमर्हति पावकः ।। 5.55.24 ।।।।

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