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वाल्मीकि रामायण 55.23

अथवा चारुसर्वाङ्गी रक्षिता स्वेन तेजसा ।
न नशिष्यति कल्याणी नाग्निरग्नौ प्रवर्तते ।। 5.55.23 ।।।।

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