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वाल्मीकि रामायण 55.13

यदि तद्विहतं कार्यं मम प्रज्ञाविपर्ययात् ।
इहैव प्राणसंन्यासो ममापि ह्यद्य रोचते ।। 5.55.13 ।।।।

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