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वाल्मीकि रामायण 54.35

तत्राम्बरादग्निरतिप्रवृद्धो रूक्षप्रभः किंशुकपुष्पचूडः ।
निर्वाणधूमाकुलराजयश्च नीलोत्पलाभाः प्रचकाशिरे ऽभ्राः ।। 5.54.35 ।।।।

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