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वाल्मीकि रामायण 54.34

आदित्यकोटीसदृशः सुतेजा लङ्कां समाप्तां परिवार्य तिष्ठन् ।
शब्दैरनेकैरशनिप्ररूढैर्भिन्दन्निवाण्डं प्रबभौ महाग्निः ।। 5.54.34 ।।।।

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