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वाल्मीकि रामायण 53.32

ततस्तीक्ष्णार्चिरव्यग्रः प्रदक्षिणशिखो ऽनलः ।
जज्वाल मृगशावाक्ष्याः शंसन्निव शिवं कपेः ।। 5.53.32।।।।

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