ग्रंथवाल्मीकि रामायणसुन्दरकाण्डसर्ग 5353.14वाल्मीकि रामायण 53.14लङ्का चारयितव्या वै पुनरेव भवेदिति । रात्रौ न हि सुदृष्टा मे दुर्गकर्मविधानतः ।। 5.53.14।।।।पिछलाअगलापूरा अध्याय