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वाल्मीकि रामायण 48.32

शराणआमग्रतस्तस्य पुनः समभिवर्तत ।
प्रसार्य हस्तौ हनुमानुत्पपातानिलात्मजः ।। ५.४८.३२।।।।

पूरा अध्याय