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वाल्मीकि रामायण 45.3

हेमजालपरिक्षिप्तैर्ध्वजवद्भिः पताकिभिः ।
तोयदस्वननिर्घोषैर्वाजियुक्तैर्महारथैः ।। ५.४५.३।।।।

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