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वाल्मीकि रामायण 41.7

इहैव तावत् कृतनिश्चयो ह्याहं यदि व्रजेयं प्लवगेश्वरालयम् ।
परात्मसंमर्दविशेषतत्त्ववित् ततः कृतं स्यान्मम भर्तृशासनम् ।। ५.४१.७।।।।

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