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वाल्मीकि रामायण 38.31

स तं प्रदीप्तं चिक्षेप दर्भं तं वायसं प्रति ।
ततस्तं वायसं दर्भः सो ऽम्बरे ऽनुजगाम ह ।। ५.३८.३१।।।।

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