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वाल्मीकि रामायण 38.30

स दर्भं संस्तराद् गृह्य ब्राह्मेमास्त्रेण योजयत् ।
स दीप्त इव कालाग्रिर्जज्वलाभिमुखो द्विजम् ।। ५.३८.३०।।।।

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