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वाल्मीकि रामायण 37.42

अयुक्तं तु कपिश्रेष्ठ मम गन्तुं त्वया ऽनघ ।
वायुवेगसवेगस्य वेगो मां मोहयेत्तव ।। ५.३७.४३।।।।

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