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वाल्मीकि रामायण 34.23

किन्नु स्याच्चित्तमोहो ऽयं भवेद्वातगतिस्त्वियम् ।
उन्मादजो विकारो वा स्यादियं मृगतृष्णिका ।। ५.३४.२३।।।।

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