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वाल्मीकि रामायण 33.4

किमर्थं तव नेत्राभ्यां वारि स्रवति शोकजम् ।
पुण्डरीकपलाशाभ्यां विप्रकीर्णमिवोदकम् ।। ५.३३.४।।।।

पूरा अध्याय