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वाल्मीकि रामायण 3.1

स लम्ब शिखरे लम्बे लम्ब तोयद सम्निभे ।
सत्त्वम् आस्थाय मेधावी हनुमान् मारुत आत्मजः ॥५-३-१॥

पूरा अध्याय