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वाल्मीकि रामायण 24.28

पुष्योत्सवसमृद्धा च नष्टभर्त्री सराक्षसा ।
भविष्यति पुरी लङ्का नष्टभर्त्री यथाङ्गना ।। ५.२४.२८।।।।

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