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वाल्मीकि रामायण 24.27

नूनं लङ्का हते पापे रावणे राक्षसाधिपे ।
शोषं यास्यति दुर्धर्षा प्रमदा विधवा यथा ।। ५.२४.२७।।।।

पूरा अध्याय