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वाल्मीकि रामायण 18.25

तं पत्रविटपे लीनः अत्रपुष्पघनावृतह् ।
समीपमिव संक्रान्तं निध्यातुमुपचक्रमे ।। ५-१८-२५।।

पूरा अध्याय