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वाल्मीकि रामायण 14.18

विधूत केशी युवतिर् यथा मृदित वर्णिका ।
निष्पीत शुभ दन्त ओष्ठी नखैर् दन्तैः च विक्षता ॥५-१४-१८॥

पूरा अध्याय