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वाल्मीकि रामायण 10.18

सम्हतौ परिघ आकारौ व्र्त्तौ करि कर उपमौ ।
विक्षिप्तौ शयने शुभ्रे पन्च शीर्षाव् इव उरगौ ॥५-१०-१८॥

पूरा अध्याय