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वाल्मीकि रामायण 67.40

वृतम् नाना विधैः पुष्पैः मृग सेवित शाद्वलम् ।
लता कुसुम संबाधम् नित्य पुष्प फल द्रुमम् ॥४-६७-४०॥

पूरा अध्याय