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वाल्मीकि रामायण 67.11

उत्सहेयम् हि विस्तीर्णम् आलिखंतम् इव अंबरम् ।
मेरुम् गिरिम् असंगेन परिगंतुम् सहस्रशः ॥४-६७-११॥

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