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वाल्मीकि रामायण 59.14

तत्र कश्चित् मया दृष्टः सूर्य उदय सम प्रभाम् ।
स्त्रियम् आदाय गच्छन् वै भिन्न अंजन चय उपमः ॥४-५९-१४॥

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