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वाल्मीकि रामायण 59.12

अहम् तात यथा कालम् आमिष अर्थी खम् आप्लुतः ।
महेन्द्रस्य गिरेः द्वारम् आवृत्य च सुसमाश्रितः ॥४-५९-१२॥

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