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वाल्मीकि रामायण 5.25

प्रति अभाषत काकुत्स्थः सुग्रीवम् प्रहसन् इव ।
उपकार फलम् मित्रम् विदितम् मे महाकपे ॥४-५-२५॥

पूरा अध्याय