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वाल्मीकि रामायण 43.19

तम् अतिक्रम्य च आकाशम् सर्वतः शत योजनम् ।
अपर्वत नदी वृक्षम् सर्व सत्त्व विवर्जितम् ॥४-४३-१९॥

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