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वाल्मीकि रामायण 33.17

हरिभिः संवृत द्वारम् बलिभिः शस्त्र पाणिभिः ।
दिव्य माल्य आवृतम् शुभ्रम् तप्त कांचन तोरणम् ॥४-३३-१७॥

पूरा अध्याय