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वाल्मीकि रामायण 31.30

बाण शल्य स्फुरत् जिह्वः सायक आसन भोगवान् ।
स्व तेजो विष संघातः पंच आस्य इव पन्नगः ॥४-३१-३०॥

पूरा अध्याय