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वाल्मीकि रामायण 30.64

चक्रवाकी इव भर्तारम् पृष्टतो अनुगता वनम् ।
विषमम् दण्डकारण्यम् उद्यान वनम् इव च अंगना ॥४-३०-६४॥

पूरा अध्याय