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वाल्मीकि रामायण 30.38

स मन्मध तीव्रतर अनुरागाकुलान्विता मन्द गतिः करेणुः ।
मदान्वितम् संपरिवार्य यान्तम्वनेषु भर्तारम् अनुप्रयाति ॥४-३०-३८॥

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