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वाल्मीकि रामायण 28.5

संध्या राग उत्थितैः ताम्रैः अंतेषु अधिक पाण्डुरैः ।
स्निग्धैः अभ्र पट च्छेदैः बद्ध व्रणम् इव अंबरम् ॥४-२८-५॥

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